ऊर्जा संकट की आहट, जलाऊ लकड़ी की मांग दोगुनी—कीमतें 1500 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंचीं

देहरादून। उत्तराखंड के बाजारों में इन दिनों एक बड़ा और चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। आमतौर पर सीमित मात्रा में बिकने वाली जलाऊ लकड़ी की मांग अचानक तेजी से बढ़ गई है। हालात यह हैं कि कई जगहों पर लकड़ी मिलना मुश्किल हो गया है, और जहां उपलब्ध है वहां इसकी कीमतें दोगुनी तक पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और संभावित युद्ध जैसी स्थिति का असर ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। इसका प्रभाव एलपीजी गैस की उपलब्धता और नीतियों पर भी देखा जा रहा है। इसी वजह से लोग अब गैस के विकल्प तलाश रहे हैं और पारंपरिक ईंधन की ओर लौटने लगे हैं।
लकड़ मंडियों के व्यापारियों के मुताबिक, पहले जलाऊ लकड़ी 600–700 रुपये प्रति कुंतल बिकती थी, जो अब बढ़कर करीब 1500 रुपये प्रति कुंतल तक पहुंच गई है। कई जगहों पर आपूर्ति कम होने के कारण व्यापारी ऊंचे दाम वसूल रहे हैं। लकड़ मंडी के व्यापारी हरबंस सिंह के अनुसार, पहले लकड़ी की खरीद सीमित होती थी, लेकिन अब होटल, रेस्टोरेंट और हलवाई जैसे व्यवसायिक उपभोक्ता बड़ी मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं। आम लोग भी गैस के विकल्प के रूप में इसका उपयोग बढ़ा रहे हैं। जलाऊ लकड़ी के साथ-साथ पारंपरिक चूल्हों और कोयले की मांग में भी तेजी आई है। व्यापारियों का कहना है कि लकड़ी की कीमत 12 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 15–18 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है, जबकि कोयले के दाम में भी करीब 5 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी हुई है।
राज्य में जलाऊ लकड़ी की आपूर्ति मुख्य रूप से वन विकास निगम के जरिए होती है, जो नीलामी के माध्यम से लकड़ी उपलब्ध कराता है। फिलहाल बिक्री पर कुछ सीमाएं तय किए जाने और नीलामी प्रक्रिया सीमित होने के कारण बाजार में आपूर्ति प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जलाऊ लकड़ी के बढ़ते उपयोग से वायु प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। हाल ही में देहरादून का एयर क्वालिटी इंडेक्स 300 के पार पहुंच गया था, जो बेहद खराब श्रेणी में आता है। ऐसे में अगर बड़े पैमाने पर लकड़ी के चूल्हों का उपयोग बढ़ता है तो पर्यावरण पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
व्यापारियों का मानना है कि बाजार की स्थिति अंतरराष्ट्रीय हालात और ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर करेगी। यदि गैस की उपलब्धता सामान्य रहती है तो हालात सुधर सकते हैं, लेकिन ऊर्जा संकट लंबा खिंचने पर लकड़ी की मांग और कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है।



