धर्म

चार वर्षों से हिमालय में अखंड तप…बर्फ, सन्नाटा और साधना के बीच साधु-संतों की अद्भुत आस्था

उत्तराखंड |  हिमालय की गोद में बसे बद्रीनाथ धाम में इन दिनों ऐसी तपस्या चल रही है, जो आम जनमानस की कल्पना से परे है। चारों ओर बर्फ की मोटी चादर, माइनस 15 डिग्री सेल्सियस तक गिरता तापमान और चारों तरफ पसरा सन्नाटा| इन सबके बीच साधु-संतों की अखंड साधना आस्था और संकल्प की एक जीवंत मिसाल बन चुकी है। इन साधकों में प्रमुख हैं स्वामी अरसानंद जी महाराज, जो पिछले चार वर्षों से लगातार बद्रीनाथ धाम में निवास कर भगवान बद्री विशाल के ध्यान में लीन हैं। भीषण ठंड, प्राकृतिक चुनौतियां और दुर्गम परिस्थितियां भी उनकी साधना को रोक नहीं पाईं।

ज्योतिर्मठ के उप जिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि बद्रीनाथ धाम में शीतकाल के दौरान रुकने की अनुमति सख्त नियमों और प्रशासनिक स्वीकृति के बाद ही दी जाती है। वर्तमान में करीब 15 साधक प्रशासन की अनुमति से यहां योग और ध्यान साधना में लीन हैं।
साधकों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन द्वारा राशन, आवश्यक दवाइयां और सुरक्षा व्यवस्था पहले से सुनिश्चित की जाती है, ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

भगवान बद्री विशाल की सेवा से जुड़े पंडित राकेश डिमरी रकुड़ी का कहना है कि शास्त्रों के अनुसार कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग हरि नाम संकीर्तन और ध्यान है। उन्होंने बताया कि इन बर्फीली वादियों में साधु-संत केवल नाम जप और ध्यान के बल पर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हैं। बद्रीनाथ धाम को कलियुग में ‘बद्रिकाश्रम’ भी कहा जाता है।

करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम इस समय पूरी तरह बर्फ से ढका हुआ है। शीतकाल में यहां आम जनजीवन ठप हो जाता है और आवाजाही लगभग असंभव हो जाती है। बावजूद इसके, 15 साधु-संत अपनी कुटियाओं, गुफाओं और आश्रमों में निरंतर तप कर रहे हैं। बर्फ, सन्नाटा और कड़ाके की ठंड भी इन साधकों के संकल्प को डिगा नहीं पाई है।

जिला अस्पताल के चिकित्सक डॉ. गौतम भारद्वाज ने बताया कि शीतकाल में तपस्या करने वाले साधु-संतों का विशेष मेडिकल परीक्षण किया जाता है। इसमें ऑक्सीजन लेवल, ब्लड प्रेशर, हड्डियों की स्थिति, हृदय और छाती की गहन जांच शामिल होती है। सभी जरूरी मेडिकल जांच पूरी होने के बाद ही साधु-संतों को मेडिकल सर्टिफिकेट जारी किया जाता है, जिसके आधार पर उन्हें शीतकाल में बद्रीनाथ धाम में रहने की अनुमति दी जाती है।

पूर्व धर्माधिकारी आचार्य भुवन उनियाल के अनुसार बद्रीनाथ धाम एक प्राचीन तपोभूमि है, जिसका अस्तित्व चारों युगों में रहा है।
शास्त्रों के अनुसार सतयुग में इसे ‘मुक्ति प्रदा’ और त्रेता युग में ‘योग सिद्धदा’ कहा गया। द्वापर और कलियुग में भी बद्रीनाथ धाम की महिमा बनी हुई है और आज भी यह स्थान योग, तप और भक्ति की परंपराओं को जीवित रखे हुए है।

बद्रीनाथ धाम में हो रही यह साधना केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मानव संकल्प, साधना और आत्मिक शक्ति की अद्भुत मिसाल है।
जहां आम इंसान का हौसला जवाब दे देता है, वहीं साधु-संत अपनी साधना के बल पर हिमालय की कठोरता को भी सहज बना लेते हैं।

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