उत्तराखंड में प्रमोशन में आरक्षण पर हाईकोर्ट का अहम आदेश, अब सरकार के पाले में फैसला

देहरादून: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य में पदोन्नति में आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने फिलहाल कोई सीधा निर्देश देने के बजाय याचिकाकर्ताओं को सरकार के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में हुई। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे उत्तराखंड सचिवालय में कार्यरत हैं और आरक्षित वर्ग से आते हैं। उनका आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता (2018) मामले में दिए गए निर्देशों का राज्य सरकार ने अब तक पालन नहीं किया है। इन निर्देशों के तहत प्रमोशन में आरक्षण देने से पहले कैडरवार डेटा तैयार करना और SC/ST के प्रतिनिधित्व का आकलन करना जरूरी है।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जेपी जोशी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी लंबित है और निर्देश अंतरिम हैं। उन्होंने बताया कि इस विषय पर न्यायमूर्ति इरशाद हुसैन समिति का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट सरकार को मिल चुकी है और मामला विचाराधीन है। अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर सचिव, कार्मिक एवं नियुक्ति विभाग को संयुक्त प्रत्यावेदन दें। साथ ही सरकार को निर्देश दिया कि इस पर यथाशीघ्र निर्णय लिया जाए, जिसे संभव हो तो 9 महीने के भीतर पूरा किया जाए।
इस फैसले का सीधा असर उत्तराखंड में प्रमोशन में आरक्षण की नीति पर पड़ सकता है। अब सरकार को कैडरवार डेटा और प्रतिनिधित्व के आधार पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। इससे आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की मांगों पर कार्रवाई तेज होने की संभावना है। हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय प्रक्रिया के तहत समाधान का रास्ता चुना है। अब अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006) मामले में कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए सरकार को पिछड़ापन, कम प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता पर असर न पड़ने के तीन बिंदु साबित करने होंगे।
वहीं 2018 में जर्नैल सिंह केस में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST के पिछड़ेपन को साबित करने की जरूरत नहीं है, लेकिन कैडरवार डेटा और प्रतिनिधित्व का आकलन अनिवार्य रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि SC/ST में क्रीमी लेयर को प्रमोशन में आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। हालिया फैसलों में कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि क्रीमी लेयर तय करने में केवल आय नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति और पद भी महत्वपूर्ण होंगे। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब नजर राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी है। आने वाले महीनों में उत्तराखंड में प्रमोशन में आरक्षण की नीति को लेकर बड़ा फैसला सामने आ सकता है।




