जवानी पहाड़ के नाम, राम कृष्ण शर्मा गुरुजी की निस्वार्थ सेवा बनी मिसाल

चमोली: पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित संसाधन और दूर-दराज़ बसे गांव—इन सबके बीच जहां अधिकतर लोग सुविधाओं की तलाश में मैदानों की ओर रुख कर लेते हैं, वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने कर्तव्य और समर्पण से इतिहास रच देते हैं। ऐसे ही एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं अलीगढ़ निवासी राम कृष्ण शर्मा, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी उत्तराखंड के पहाड़ों के नाम कर दी।
वर्ष 1997 में राम कृष्ण शर्मा की पहली नियुक्ति चमोली जनपद के दूरस्थ क्षेत्र बाजबगड़ में हुई। उस समय पहाड़ों में सरकारी सेवा देना किसी चुनौती से कम नहीं था। न तो पर्याप्त संसाधन थे, न ही बेहतर सुविधाएं। संचार, परिवहन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं भी सीमित थीं। ऐसे में अधिकांश कर्मचारी यहां टिकने से कतराते थे। साल 2000 में जब उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ, तो एक ओर जहां प्रदेश के विकास की उम्मीदें जगीं, वहीं दूसरी ओर कई कर्मचारियों ने पहाड़ छोड़कर उत्तर प्रदेश या अन्य मैदानी क्षेत्रों का रुख कर लिया। यहां तक कि कई स्थानीय शिक्षक भी बेहतर सुविधाओं के लिए पहाड़ों को अलविदा कह गए। लेकिन राम कृष्ण शर्मा ने इन परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने न केवल पहाड़ में अपनी सेवा जारी रखी, बल्कि वहां के बच्चों की शिक्षा और उनके उज्ज्वल भविष्य को अपना लक्ष्य बना लिया। वर्षों तक उन्होंने सीमित संसाधनों के बीच रहकर बच्चों को शिक्षित किया, उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का कार्य किया। उनके पढ़ाए हुए कई छात्र आज विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर रहे हैं, जो उनके समर्पण का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
राम कृष्ण शर्मा का मानना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे पहाड़ों का भविष्य बदला जा सकता है। उन्होंने हर परिस्थिति में विद्यालय को प्राथमिकता दी—चाहे मौसम की मार हो या संसाधनों की कमी, उन्होंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया। यही कारण है कि वे छात्रों और अभिभावकों के बीच एक आदर्श शिक्षक के रूप में स्थापित हुए। उनका जीवन उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो छोटी-छोटी कठिनाइयों के कारण अपने कर्तव्यों से पीछे हट जाते हैं या पहाड़ों से पलायन को ही समाधान मान लेते हैं। राम कृष्ण शर्मा ने अपने कर्म से यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची निष्ठा और समर्पण के साथ किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है।
वर्षों की अथक और निस्वार्थ सेवा के बाद जब उनकी सरकारी सेवा पूर्ण हुई, तो क्षेत्रवासियों और उनके विद्यार्थियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि और सम्मान के साथ विदाई दी। यह विदाई केवल एक शिक्षक की नहीं, बल्कि एक युग की विदाई थी, जिसने पहाड़ के बच्चों के जीवन को दिशा देने का कार्य किया। राम कृष्ण शर्मा का जीवन समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और सच्ची शिक्षक भावना का जीवंत उदाहरण है। ऐसे शिक्षक समाज की वह नींव होते हैं, जिन पर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य टिका होता है। उनका योगदान सदैव याद रखा जाएगा और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।




