
चमोली: चिपको आंदोलन की वर्षगांठ के अवसर पर एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता को लेकर जागरूकता का संदेश सामने आया है।1970 के दशक में गढ़वाल के रेणी गाँव से शुरू हुआ यह आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने तक सीमित नहीं था,बल्कि प्रकृति से जुड़ने का एक गहरा दर्शन था।गौरा देवी की 53वीं वर्षगांठ पर जोशीमठ में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज “भोगवादी संस्कृति” से हटकर “जल और वन संस्कृति” को अपनाना समय की मांग है, क्योंकि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही सुरक्षित भविष्य की कुंजी है। “पेड़ बचेंगे तो पहाड़ बचेंगे, पहाड़ बचेंगे तो जीवन बचेगा।”
गौर देवी और ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर यह साबित किया कि जंगल लकड़ी भर नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी और हवा जैसे जीवन के आधार हैं।पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट और सुन्दरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया,जिससे यह वैश्विक पहचान बना सका।हालांकि 52 वर्षों बाद भी हालात चिंताजनक हैं,लगातार हो रही पेड़ों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण और बढ़ता प्रदूषण पर्यावरण और मानव जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।




