
चमोली।उत्तराखंड की आस्था और लोक परंपरा से जुड़ी माँ नंदादेवी की बड़ी जात यात्रा होमकुंड में परंपरा के अनुसार संपन्न होने के बाद अब देव डोलियों का अपने-अपने पड़ावों की ओर लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है।
होमकुंड में बड़ी जात की विधिवत संपन्नता के बाद माँ नंदादेवी की डोली वापस अपने मायके सिद्धपीठ कुरूड़ मंदिर पहुंच गई है।डोली के कुरूड़ पहुंचने पर ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच मां नंदा का भव्य स्वागत किया।इस दौरान पूरा कुरूड़ क्षेत्र मां नंदा के जयकारों से गूंज उठा।बड़ी संख्या में श्रद्धालु डोली के दर्शन और आशीर्वाद लेने के लिए मौजूद रहे।
परंपरा के अनुसार,बड़ी जात के बाद मां नंदा की डोली का अपने मायके कुरूड़ लौटना धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशेष महत्व रखता है।डोली के वापस पहुंचने के साथ ही श्रद्धालुओं के बीच उत्साह का माहौल है और मंदिर परिसर में मां नंदा के दर्शन के लिए भक्तों की आवाजाही बनी हुई है।
वहीं दूसरी ओर माँ नंदा राजराजेश्वरी की डोली भी अपनी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव पूरे करने के बाद वैदनी कुंड की परिक्रमा कर अपने नैनिहाल देवराड़ा पहुंच गई है।देवराड़ा पहुंचने पर डोली को मंदिर में विधि-विधान के साथ विराजमान कराया गया।
अब माँ नंदा राजराजेश्वरी अगले छह माह तक देवराड़ा मंदिर में ही विराजमान रहेंगी और इस अवधि में अपने भक्तों को दर्शन देंगी।इस दौरान आसपास के गांवों के साथ ही दूर-दराज से श्रद्धालु मां नंदा के दर्शन के लिए देवराड़ा पहुंचेंगे।
छह माह की अवधि पूरी होने के बाद माँ नंदा राजराजेश्वरी पुनः अपने मायके सिद्धपीठ कुरूड़ मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगी।इसके बाद अगली कैलाश यात्रा तक मां नंदा कुरूड़ मंदिर में ही विराजमान रहकर भक्तों को दर्शन देंगी।
माँ नंदादेवी की डोलियों की यह यात्रा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि चमोली की सदियों पुरानी लोक परंपरा,संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक मानी जाती है। डोली के प्रत्येक पड़ाव पर ग्रामीण पारंपरिक रीति-रिवाजों और वाद्य यंत्रों के साथ मां नंदा का स्वागत करते हैं और यात्रा से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ भाग लेते हैं।




