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8 अगस्त को देहरादून में मांगल गर्ल नंदा सती को मिलेगा तीलू रौतेली राज्य शक्ति पुरस्कार

देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने प्रतिष्ठित तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार और राज्य स्तरीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कार के लिए चयनित महिलाओं की घोषणा कर दी है।तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार के लिए प्रदेश के सभी 13 जनपदों से एक-एक महिला का चयन किया गया है।जबकि राज्य स्तरीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कार के लिए विभिन्न जिलों की 35 उत्कृष्ट आंगनबाड़ी कार्यकर्तियों को सम्मानित किया जाएगा।दोनों पुरस्कार आठ अगस्त को देहरादून में आयोजित राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति में प्रदान किए जाएंगे।

इस वर्ष चयनित महिलाओं ने संस्कृति, खेल, वैज्ञानिक शोध, पर्यावरण संरक्षण, कृषि, स्वरोजगार, समाजसेवा, महिला सशक्तीकरण और दिव्यांगजन कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। सरकार का उद्देश्य ऐसी प्रेरणादायी महिलाओं की उपलब्धियों को समाज के सामने लाना है, ताकि उनकी सफलता अन्य महिलाओं और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सके। महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्या ने कहा कि तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार उन महिलाओं को समर्पित है, जिन्होंने संघर्ष, साहस और समर्पण के बल पर समाज में विशिष्ट पहचान बनाई है।

सीमांत जनपद चमोली के पिंडर घाटी के नारायणबगड ब्लाॅक के नारायणबगड गांव की रहने वाली है नंदा सती। नंदा के पिताजी ब्रह्मानंद सती पंडिताई का कार्य करते हैं जबकि मां गृहणी है। तीन बहिनों में नंदा सबसे छोटी हैं जबकि उनका एक छोटा एक भाई भी हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर 12 वीं की शिक्षा नंदा नें नारायणबगड से प्राप्त की। हेमवंती नंदन केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर से स्नातक और संगीत विषय में स्नाकोत्तर की डिग्री हासिल की है।वर्तमान में नंदा सती संगीत विषय में पीएचडी कर रही हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में संगीत विषय में विजिटिंग प्रोफेसर है।

छोटी सी उम्र में नंदा सती द्वारा गाये जानें वाले मांगल गीतों और लोकगीतों को सुनकर हर कोई अचंभित हो जाता है। मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति पर उनकी लोक को चरितार्थ करती जादुई आवाज और हारमोनियम पर थिरकती अंगुलियां लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती है। लोग के मध्य नंदा सती,मांगल गर्ल के नाम से प्रसिद्ध है। जिस उम्र में आज की युवा पीढ़ी मोबाइल, मेट्रो और गैजेट की दुनिया में खोई रहती है उस उम्र में नंदा का अपनीं लोकसंस्कृति से इतना लगाव उन्हें अलग पंक्ति में खडा करता है। नंदा नें मांगल गीतों के संरक्षण और संवर्धन के जरिये एक नयी लकीर खींची हैं। भले ही नंदा सती के घर के ठीक सामने बहनें वाली पिंडर नदी में हर दिन लाखों क्यूसिक मीटर पानी बिना शोर शराबे के यों ही बह जाता हो परंतु नंदा के मांगल गीतो की गूंज देश दुनिया तक गूंज रहे हैं। अपने नाम के मायनों को चरितार्थ करती हुई नंदा पहाड के लोक में रचे बसे मांगल गीतों और लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन में बडी शिद्दत से जुटी हुई है। नंदा अभी तक 5 हजार से अधिक महिलाओं और बच्चों को लोकगीतों का प्रशिक्षण दे चुकी है। संगीत के लिए नंदा को विभिन्न मंचों पर दर्जनों सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हाथों संगीत विषय में गोल्ड मेडल,

मांगल गर्ल नंदा सती को 2023 में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के द्वारा मास्टर ऑफ आर्ट (संगीत विषय) में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। मांगल गर्ल नंदा सती नें गोल्ड मेडल हासिल करके न केवल गढवाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का नाम ऊँचा किया अपितु पहाड़ की बेटियों के लिए नये प्रतिमान भी स्थापित किया है। मांगल गर्ल नंदा सती नें मास्टर ऑफ आर्ट (संगीत) में गोल्ड मेडल हासिल करके ये संदेश दिया है कि आज पहाड़ की बेटियाँ केवल खेत खलिहान, घास लकडी और चूल्हा चौके तक ही सीमित नहीं है। अब वो हर क्षेत्र में आगे बढ रही है और सफलता हासिल करने में सक्षम है।

मांगल गर्ल नंदा सती कहती हैं लोकगीत और मांगल गीत हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। लोकगीत पीढी दर पीढी एक दूसरे को हस्तांतरित होते हैं। इनके बिना पहाड़ के लोक की कल्पना करना असंभव है।मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ की मुझे मांगल गीतों की समझ और महत्ता अपने गांव के बुजुर्गों से विरासत में मिली, जो बरसों से इनको संजोते आ रहें हैं।

हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा के लोकगीतों और जागरों का संरक्षण और संवर्धन कर रहीं हैं नंदा सती

नंदा सती विगत 10 सालों से हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा देवी के जागरों और लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन में बडी शिद्दत से जुटी हुई है। वे आगामी नंदा देवी की बड़ी जात से पहले मां नंदा देवी के जागरों और लोकगीतों की एल्बम भी निकालने वाली है। नंदा सती बच्चो को हारमोनियम बजाने और मांगल गीतों को गाने की ट्रेनिंग भी देती हैं। अभी तक वो 2 हजार से भी ज्यादा बच्चों को लोकगीतों का प्रशिक्षण दे चुकी हैं।

कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये मांगल और लोकगीतों को हजारों लोगों तक पहुंचाया ..

भले ही कोरोना काल लोगों के लिए दुःस्वप्न साबित हुआ हो लेकिन नंदा सती नें इस कठिन दौर में भी अपनी मांगल गीतों के जरिये लोकसंस्कृति की सौंधी खुशबू को देश विदेश तक हजारों लोगों तक पहुंचाया। नंदा सती नें लाॅकडाउन की अवधि में विभिन्न ग्रुपों, संगठनों, फेसबुक लाइव, इंस्टाग्राम और यूट्यूब के जरिये मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। कोरोना काल में नंदा नें बच्चों को ऑनलाइन प्रशिक्षण भी दिया, जिस कारण लोगों को झुकाव अपने पौराणिक मांगल गीतों की ओर हुआ। खासतौर पर युवा पीढ़ी के युवाओं को नंदा की ये अनूठी मुहिम बेहद पसंद आई।

उत्तराखंड सरकार ने प्रतिष्ठित तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार और राज्य स्तरीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कार के लिए चयनित महिलाओं की घोषणा कर दी है। तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार के लिए प्रदेश के सभी 13 जनपदों से एक-एक महिला का चयन किया गया है। जबकि राज्य स्तरीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कार के लिए विभिन्न जिलों की 35 उत्कृष्ट आंगनबाड़ी कार्यकर्तियों को सम्मानित किया जाएगा। दोनों पुरस्कार आठ अगस्त को देहरादून में आयोजित राज्य स्तरीय सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति में प्रदान किए जाएंगे। इस वर्ष चयनित महिलाओं ने संस्कृति,खेल,वैज्ञानिक शोध, पर्यावरण संरक्षण, कृषि, स्वरोजगार,समाजसेवा,महिला सशक्तीकरण और दिव्यांगजन कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। सरकार का उद्देश्य ऐसी प्रेरणादायी महिलाओं की उपलब्धियों को समाज के सामने लाना है, ताकि उनकी सफलता अन्य महिलाओं और युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सके। महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्या ने कहा कि तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार उन महिलाओं को समर्पित है, जिन्होंने संघर्ष, साहस और समर्पण के बल पर समाज में विशिष्ट पहचान बनाई है।

मांगल और नंदा के लोकगीतों नयी पहचान दे रही है ‘मांगल गर्ल’ नंदा सती

सीमांत जनपद चमोली के पिंडर घाटी के नारायणबगड ब्लाॅक के नारायणबगड गांव की रहने वाली है नंदा सती। नंदा के पिताजी ब्रह्मानंद सती पंडिताई का कार्य करते हैं जबकि मां गृहणी है। तीन बहिनों में नंदा सबसे छोटी हैं जबकि उनका एक छोटा एक भाई भी हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर 12 वीं की शिक्षा नंदा नें नारायणबगड से प्राप्त की। हेमवंती नंदन केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर से स्नातक और संगीत विषय में स्नाकोत्तर की डिग्री हासिल की है। वर्तमान में नंदा सती संगीत विषय में पीएचडी कर रही हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में संगीत विषय में विजिटिंग प्रोफेसर है। छोटी सी उम्र में नंदा सती द्वारा गाये जानें वाले मांगल गीतों और लोकगीतों को सुनकर हर कोई अचंभित हो जाता है। मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति पर उनकी लोक को चरितार्थ करती जादुई आवाज और हारमोनियम पर थिरकती अंगुलियां लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती है। लोग के मध्य नंदा सती, मांगल गर्ल के नाम से प्रसिद्ध है। जिस उम्र में आज की युवा पीढ़ी मोबाइल, मेट्रो और गैजेट की दुनिया में खोई रहती है उस उम्र में नंदा का अपनीं लोकसंस्कृति से इतना लगाव उन्हें अलग पंक्ति में खडा करता है। नंदा नें मांगल गीतों के संरक्षण और संवर्धन के जरिये एक नयी लकीर खींची हैं। भले ही नंदा सती के घर के ठीक सामने बहनें वाली पिंडर नदी में हर दिन लाखों क्यूसिक मीटर पानी बिना शोर शराबे के यों ही बह जाता हो परंतु नंदा के मांगल गीतो की गूंज देश दुनिया तक गूंज रहे हैं। अपने नाम के मायनों को चरितार्थ करती हुई नंदा पहाड के लोक में रचे बसे मांगल गीतों और लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन में बडी शिद्दत से जुटी हुई है। नंदा अभी तक 5 हजार से अधिक महिलाओं और बच्चों को लोकगीतों का प्रशिक्षण दे चुकी है। संगीत के लिए नंदा को विभिन्न मंचों पर दर्जनों सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के हाथों संगीत विषय में गोल्ड मेडल,

मांगल गर्ल नंदा सती को 2023 में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के द्वारा मास्टर ऑफ आर्ट (संगीत विषय) में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। मांगल गर्ल नंदा सती नें गोल्ड मेडल हासिल करके न केवल गढवाल केंद्रीय विश्वविद्यालय का नाम ऊँचा किया अपितु पहाड़ की बेटियों के लिए नये प्रतिमान भी स्थापित किया है। मांगल गर्ल नंदा सती नें मास्टर ऑफ आर्ट (संगीत) में गोल्ड मेडल हासिल करके ये संदेश दिया है कि आज पहाड़ की बेटियाँ केवल खेत खलिहान, घास लकडी और चूल्हा चौके तक ही सीमित नहीं है। अब वो हर क्षेत्र में आगे बढ रही है और सफलता हासिल करने में सक्षम है।

गांव के बुजुर्गों से विरासत में मिली मांगल और लोकगीतों की समझ और गुनगुना

मांगल गर्ल नंदा सती कहती हैं लोकगीत और मांगल गीत हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। लोकगीत पीढी दर पीढी एक दूसरे को हस्तांतरित होते हैं। इनके बिना पहाड़ के लोक की कल्पना करना असंभव है। मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ की मुझे मांगल गीतों की समझ और महत्ता अपने गांव के बुजुर्गों से विरासत में मिली, जो बरसों से इनको संजोते आ रहें हैं।

हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा के लोकगीतों और जागरों का संरक्षण और संवर्धन कर रहीं हैं नंदा सती

नंदा सती विगत 10 सालों से हिमालय की अधिष्ठात्री देवी मां नंदा देवी के जागरों और लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन में बडी शिद्दत से जुटी हुई है। वे आगामी नंदा देवी की बड़ी जात से पहले मां नंदा देवी के जागरों और लोकगीतों की एल्बम भी निकालने वाली है। नंदा सती बच्चो को हारमोनियम बजाने और मांगल गीतों को गाने की ट्रेनिंग भी देती हैं। अभी तक वो 2 हजार से भी ज्यादा बच्चों को लोकगीतों का प्रशिक्षण दे चुकी हैं।

कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये मांगल और लोकगीतों को हजारों लोगों तक पहुंचाया ..

भले ही कोरोना काल लोगों के लिए दुःस्वप्न साबित हुआ हो लेकिन नंदा सती नें इस कठिन दौर में भी अपनी मांगल गीतों के जरिये लोकसंस्कृति की सौंधी खुशबू को देश विदेश तक हजारों लोगों तक पहुंचाया। नंदा सती नें लाकडाउन की अवधि में विभिन्न ग्रुपों, संगठनों, फेसबुक लाइव, इंस्टाग्राम और यूट्यूब के जरिये मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। कोरोना काल में नंदा नें बच्चों को ऑनलाइन प्रशिक्षण भी दिया, जिस कारण लोगों को झुकाव अपने पौराणिक मांगल गीतों की ओर हुआ। खासतौर पर युवा पीढ़ी के युवाओं को नंदा की ये अनूठी मुहिम बेहद पसंद आई।

बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं मांगल गर्ल नंदा सती का चयन प्रतिष्ठित तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार के लिए होने पर बहुत बहुत बधाई आशा और उम्मीद करते हैं कि पहाड़ के लोक संगीत को आप नई ऊंचाईया प्रदान करेंगे।

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